Tuesday, December 17, 2013

चीख !!

हॉस्पिटल से आने के बाद दिया ने आज माँ से आईना माँगा | माँ आँखों में आँसू भर कर बोली ना देख बेटा आईना, देख न सकेगी तू |” पर दिया की जिद के आगे उसकी एक न चली और उसने आईना ला कर धड़कते दिल से दिया के हाथ में थमा दिया और खुद उसके पास बैठ गई | दिया ने भी धड़कते दिल से आईना अपने चेहरे के सामने किया और एक तेज चीख पूरे घर में गूँज गई, माँ की गोद में चेहरा छुपा कर फूट-फूट कर रो पड़ी दिया | माँ ने अपने आँसू पोंछे और उसके सिर पर स्नेह से हाथ फेरते हुए बोली कि मैंने तो पहले ही तुझसे बोला था कि मत देख आईना पर तू ही नही मानी |” माँ का कलेजा भी फटा जा रहा था अपनी बेटी की ये दशा देख कर | 
कितनी खुश थी उस दिन दिया जब वो कोलेज की सबसे सुन्दर लड़की चुनी गई थी | तभी महेश से उसकी दोस्ती हुई | सब कुछ अच्छा चल रहा था बीएसी फाइनल में जब उसकी शादी तय हुई तब उसने ये खुशखबरी महेश को दी, वो एकदम आगबबूला हो गया ये कैसे हो सकता है, प्यार मुझसे और शादी किसी और से ?” ये सुन कर दिया आवाक रह गई | दिया ने उसे बहुत समझाया कि वो दोनों एक अच्छे दोस्त के सिवा कुछ भी नही पर महेश अपनी जिद पर अड़ा रहा | उसने दिया को घमकी दी कि वो उसकी शादी किसी और से नही होने देगा | दिया ने उसकी बातों को कोई महत्व नही दिया और उससे मिलना-जुलना, बात करना सब बंद कर दिया | ठीक सगाई से एक दिन पहले जब वो पार्लर जा रही थी, उसके सामने से एक बाइक निकली और दिया के मुंह से हृदयविदारक चीख निकल गई थी |

Tuesday, December 3, 2013

चलो मिलते हैं वहाँ !!

धरती के उस छोर पर 
धानी चूनर ओढ़ कर   
वसुधा मिलती हैं अनन्त से जहाँ
चलो मिलते हैं वहाँ !!

बन्धन सारे तोड़ कर
लहरों की चादर ओढ़ कर
दरिया मिलता है किनारे से जहाँ
चलो मिलते हैं वहाँ !!

पर्वतों से निकल कर
लम्बी दूरी चल कर
नदियाँ मिलती है सागर से जहाँ
चलो मिलते हैं वहाँ !!

बसंती भोर में
खिले उपवन में
भँवरे फूलों से मिलते हैं जहाँ
चलो मिलते हैं वहाँ !!

स्वाति नक्षत्र के
वर्षा की इक बूँद से
तृप्त हो चातक मिलता है जहाँ
चलो मिलते हैं वहाँ !!

पूनम की रात में
चाँदनी विस्तार से
किलोल करती मिलती हैं जहाँ
चलो मिलतें हैं वहाँ!!

जमुना के तट पर
बाँध उमंगो की डोर
मिलती है राधा कृष्ण से जहाँ
चलो मिलते हैं वहाँ !!

सांसों की लय तोड़ कर
नश्वर काया छोड़ कर
आत्मा परमात्मा से मिलती है जहाँ
चलो मिलते हैं वहाँ !!

*मीना पाठक*

Thursday, November 21, 2013

फरेब

*फरवरी का महीना है, दिन के ग्यारह बज चुके हैं पर अभी तक सुर्य देव के दर्शन नही हुए हैं वातावरण कोहरे से घिरा हुआ है ऐसे मे ठण्ड से कंपकपाती हुई सुमित्रा ने अपना गेट खटखटाया, दो मिनट रुक कर फिर से खटखटाते हुए बोली  बेटा गेट खोलो जल्दी, बहुत ठण्ड है | थोड़ी देर बाद ही गेट खुल गया सामने उसका छोटा बेटा खड़ा था | सुमित्रा फिर से बोली अन्दर से जा कर एक लोटा पानी ले आओ | वो क्या करोगी मम्मी ? बेटे ने सवाल कर दिया |ज्यादा सवाल ना करो, जल्दी से ले कर आओ | सुमित्रा बेटे को डपटते हुए बोली | बेटा भाग कर अन्दर गया और रसोई से लोटे में पानी ले आया | सुमित्रा ने लोटे के पानी से कुल्ली की, हाथ मुंह धोया और गेट के अन्दर आ गयी | जल्दी से नहा कर सारे उतरे हुए कपड़े धो कर छत पर सूखने को डालने के बाद नीचे आ के रजाई दुबक गई रोने की वजह से उसकी आँखों में जलन हो रही थी फिर भी उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े, निकलते क्यों नही आज वो अपनी सबसे प्रिय सखी को विदा कर के आ रही थी | उसे याद आ रहा था जब वो पिछली बार उससे मिलने गयी थी तब उसने कितनी सारी बाते उससे की थी, अपने दिल की सारी भड़ास निकालने के बाद उसने मुझसे कहा  सुमी तेरे बेटे की शादी तय हो गयी ? मैंने कहा   नही अभी कहीं बात नही बनी |
उसने फिर से कहा 
–“अपने बेटे की शादी में मुझे बरात ले चलेगी ना ?
मैंने कहा- 
कैसी बाते करती है बेबी तेरे बिना मै अपने बेटे की बरात ले के जाऊंगी क्या, तुझे बारात भी चलना है और बेटे की शादी में डांस भी करना है |
 तू ना बुलाए तो भी मै आऊँगी तू देख लेना | बोली थी बेबी अच्छा अब तू सो जा, डा० ने तुझे ज्यादा बोलने के लिए मना किया है |
किसी तरह उसे उस दिन सुला कर मै घर आ गयी थी और आज सुबह-सुबह ही ये मनहूस खबर आ गयी कि बेबी इस दुनिया में नही रही |
बेबी  से मेरी दोस्ती करीब २५ साल पुरानी थी | आज भी मुझे याद है जब मै यहाँ नई-नई रहने आई थी तब यहाँ आये दिन किसी न किसी के घर पूजा रखी जाती थी कारण ये था कि यहाँ नये-नये घर बन रहे थे और जो भी रहने के लिए आता अपने घर में पूजा रखता तो उसी में हम दोनों का मिलना होता था | वो मुझे देख कर आकर्षित थी और मै उसे, वो सांवली-सलोनी व बेहद खूबसूरत नाक-नक्श की स्वामिनी थी; हर बात को मजाक बना के हँस देना उसका स्वभाव था | सामने वाले की कोई ना कोई ऐसी कमी निकाल देती थी कि हम दोनों हँसते 
 हँसते लोट - पोट हो जाते थे, मै उसे डांटती थी कि - क्या हर किसी की कमी निकालती रहती है तो उसका जवाब होता तू हँसती हुयी बहुत अच्छी लगती है इसी लिए जब तू साथ होती है तब मैं तुझे हंसाने का कोई बहाना नही छोड़ती,हमेशा मुंह लटकाए रहती है तू |
हम दोनों थे तो बिल्कुल बिपरीत स्वभाव के पर हमारे दिल आपस में जुड़ गये थे | वो हँसमुख और जिंदादिल थी तो मैं गम्भीर और चुप रहने वाली |
धीरे-धीरे हम दोनों की दोस्ती गहराती गयी और हम दोनों एक दूसरे की आदत बन गये थे; अपने दिल की और घर-गृहस्ती की हर बात एक दूसरे से साझा किये बिना हम नही रह पाते थे | घर में हमारी दोस्ती सभी को खटकती थी | जब भी वो मेरे घर आती सभी खुसुर-फुसुर करने लगते कि
हो गयी अब दो तीन घंटे की छुट्टी और सच् में उसके साथ समय कैसे बीत जाता था पता ही नही चलता था | वो जब भी आती मेरे अन्दर ऊर्जा का संचार हो जाता था, वो हँसते-हँसाते मेरे अन्दर नई स्फूर्ती पैदा कर जाती थी; मैंने सपने में भी नही सोचा था कि इतनी ज़िंदा दिल स्त्री ऐसे सदमे से इस दुनिया से विदा हो जायेगी | दर्द से मेरा सिर फटा जा रहा था और आँखों में बेहद जलन | रजाई में मेरा शरीर गर्म हो गया था पता नही कब मुझे नींद लग गयी |
गाड़ी का हार्न सुनके मरी आँख खुल गयी, रजाई से मैंने सिर बाहर निकाला रात के आठ बज चुके थे | मैंने बेटे को हल्के से डांट लगाईं 
मुझे जगा नही सकते थेपापा ने मना किया था बेटे ने जवाब दिया, उन्हें मेरी हालत का अंदाजा था इसी लिए वो बाहर से ही खाना ले कर आये थे | अन्दर आते ही पूछा इन्होने कैसी तबियत है तुम्हारी इनका इतना पूछना था कि फिर से मेरी आँसू गिरने लगे और मैं सिसकने लगी | ये मेरी पीठ थपका कर मेरे आँसू पोंछते हुए बोले इस तरह तो तुम्हारी तबियत खराब हो जाएगी जो होना था वो तो हो गया अपने को संभालो | रो-रो कर अपनी क्या हालत कर ली है तुमने,चेहरा देखो अपना सीसे में| मेरी आँखे रोते रोते सूज गयी थी और आस पास लाल घेरा बन गया था | मुझे इन्होने बिस्तर से उतरने नही दिया जबरजस्ती से चाय पिलाई और थोड़ा सा खाना खिलाया | थोड़ी देर मै यूँ ही बैठी रही फिर सभी अपने - अपने बिस्तर में लेट गये | मेरी आँखों में नींद नही थी | बेबी नही है विश्वास नही हो रहा था जब कि मेरी आँखों के सामने ही उसे सजा संवार के विदा कर दिया गया था .......
आज मुझे उसकी सारी बातें याद आ रही थी | जब उसे पहली बार दिल का दौरा पड़ा था,  मै सुन कर अचम्भे में पड़ गयी थी कि 
बेबी को दिल का दौरा ? ऐसा कैसे हो सकता है वो तो हमेशा खुश रहती है | मैं भागते हुए हस्पताल पहुँची थी | वहाँ जा कर उसे देखा तो उसका चेहरा काला पड़ गया था ऐसा लग रहा था जैसे वर्षों से बीमार हो | मुझे देख कर उसकी आँखों से दो आँसू टपक गये मेरी भी आँखे भीग गई मैंने उसके सिर पर हाथ फेरा उसका हाथ अपने हाथ मे ले कर थोड़ी देर बैठी रही और घर आ गयी थी क्यों कि वहाँ ज्यादा देर बैठने की इजाज़त नही थी, ना वो कुछ बोली थी ना मै कुछ बोल सकी थी | कुछ दिनों बाद मैं उससे मिलने उसके घर गयी थी तब वो कुछ ठीक थी पर अब वो परहेजी खाना, और दवाइयों पर रहने लगी थी | पहले जैसी नही रह गयी थी वो, कमजोर भी हो गयी थी, घर का काम करना अब भारी था उसके लिए तो उसने गाँव से अपनी दूर की एक बहन बुला ली थी कुछ दिन के लिए मै भी निश्चिन्त थी कि बेबी अब बड़े आराम से आराम कर रही है | वो चार बहने थीं और B.A. कर के घर में ही रहती थी पापा किसान थे तो उसे भी यहाँ रहने में कोई परेशानी नही थी| अचानक ही मुझे किसी काम से  अपने बेटे के पास दिल्ली जाना पड़ा | मै एक महीने बाद वापस आई तो दूसरे ही दिन उससे मिलने उसके घर पहुँच गयी देखा वो लेटी हुई थी उसकी बहन ने उसे जगाया "दीदी देखो, सुमी दीदी आयी हैं" और वो अन्दर चली गयी | मुझे देख कर वो थोड़ा खुश हुई मगर फिर से उसका चेहरा मुझे बुझा  बुझा सा लगा | मै बैठ गयी उसके पास और बोली - अब कैसी हो बेबी ?अब तो शायद ही कभी ठीक हो पाऊँ सुमी डबडबाई हुई आँखों से वो कराहते हुए बोली |
ना जाने क्यों मुझे लगा कि ये अपनी बीमारी से ज्यादा किसी और दर्द से पीड़ित है | मैं बोली 
शुभ-शुभ बोलो बेबी, ऐसा क्यों बोलती हो, तुम बहुत जल्दी अच्छी हो जाओगी और हम दोनों फिर से मस्ती करेंगे | वो हल्के से मुस्कुराई और बोली ईश्वर करे ऐसा ही हो और वो फिर से लेट गई | मुझे लगा कि वो मुझसे कुछ छुपा रही है, मैंने पूछा तू मुझसे कुछ छुपा रही है? ऐसा मुझे क्यों लग रहा है, बोल नापहले मुझसे वादा कर कि तू किसी को भी नही बताएगी ये सब बेबी बोली | मैंने कहा  ठीक है तू कहती है तो नही बताऊँगी किसी को मुझे क्या पता था कि उसने मुझसे किस बात को ना बताने का वादा ले लिया है | थोड़ा सा ना-नुकुर के बाद उसने जो भी मुझे बताया, मेरे पांव तले ज़मीन खिसक गयी, सन्न रह गयी मै, दिन मे ही तारे नजर आने लगे मुझे  | ऐसा भी हो सकता है, मैं सोच भी नही सकती थी | भाई साहब तो बहुत अच्छे और गंभीर हैं ऐसे कैसे बहक गये | उसने मुझे बताया ..........................
उस दिन रविवार का दिन था मैने सुबह सारा काम किया सब को नाश्ता दे कर खुद भी नाश्ता किया और अखबार ले कर बैठ गयी पढ़ने के लिए | ऊपर ग्रिल लगना था वो कई दिनों से रखा था, ये उसी को पेंट करने बैठ गये थे | मै इनके पीछे कुर्सी पर बैठ कर अखबार पढ़ने लगी थी | थोड़ी देर बाद ही मुझे लगा कि मेरे दिल के पास से कुछ रेंगता हुआ ऊपर की तरफ़ बढ़ रहा है, और तब मुझे पता ही नही चला कि कब मै कुर्सी से उठ कर अन्दर बेड पर गिर पड़ी | गिरने की आवाज सुन के इन्होने पेंट करते हुए मुझसे पूछा 
 क्या हुआ ?  मेरे मुंह से कोई आवाज नही निकली मैं अपना सीना दबाये हुए जल बिन मछली की तरह तड़पती रही | वो दर्द धीरे-धीरे मेरे कंधे की तरफ़ बढ़ रहा था | इन्होने फिर पूछा क्या हुआ ? मै फिर कुछ ना बोल सकी, तड़पती रही उसी तरह | तीसरी बार भी जब मेरी आवाज नही आयी तब इन्होने पलट कर अन्दर मुझे तड़पते हुए देखा फिर ये सब छोड़ कर भाग कर मेरे पास आये क्या हुआ बेबी, क्या हुआ तुम्हे मेरी आवाज नही निकली मैं पसीने से लतफत थी, मैने हाथ हिला कर हवा करने के लिए इशारा किया ये दौड़ कर हाथ वाला पंखा ले आये और मुझ पर तेजी से हवा करने लगे | मेरा दर्द अब कलाई की तरफ़ बढ़ रहा था और मै अपना कंधा पकड़े बिस्तर पर तड़प रही थी | कलाई के पास पहुँच कर दर्द धीरे-धीरे शांत होने लगा था तब तक लाइट आ गई थी | थोड़ी देर तक मै कंधा पकड़े - पकड़े बैठी रही, जब दर्द पूरी तरह शांत हो गया तब मैं फिर से बाहर आ के अपनी जगह बैठ गयी और ये फिर से पेंट करने लगे | मैं आश्चर्यचकित थी कि ये क्या हुआ मुझे, ये समझ गये थे पर इधर-उधर की बातों से मुझे बहला रहे थे | इतने मे ही गेट खटका, मैंने उठ कर दरवाजा खोला, मुझे अजीब सी कमजोरी महसूस हुई मै आ के फिर से धम्म से कुर्सी पर बैठ गई | मेरे पड़ोस के ही एक लोग मिलने आये थे मेरी बगल वाली कुर्सी पर वो बैठ गये | मेरे कुछ बोलने से पहले ही वो बोल पड़े क्या बात है भाभी जी ? आप बीमार थी क्या ? तब मैंने उनको सारी बात बताई और ये भी बताया की अब मुझे कोई दर्द नही है पर कमजोरी महसूस हो रही है | उन्होंने कहा आप का चेहरा ऐसा लग रहा है जैसे आप कई दिनों से बीमार हैं इसी लिए मैंने पूछा, दर्द नही है  पर आप डा० को जरूर दिखा दीजियेगा इस दर्द को हल्के मे मत लीजिएगा | सलाह दे कर वो चले गये पर ये मुझे डा० के पास नही ले गये |
अब मुझे कभी कभी सीने मे कुछ दर्द सा महसूस होता था और जब भी दर्द होता था मैं बिस्तर पकड़ लेती थी | ये कभी गैस का दर्द कह कर तो कभी बहुत सोचती हो ये कह कर टाल देते थे | धीरे-धीरे पन्द्रह दिन बीत गये फिर से वही पड़ोसी मुझे देखने आये | मेरी हालत देख कर वो इन पर नाराज हुए 
क्या भाई साहब आप ने अभी तक भाभी जी को डा० को नही दिखाया वो एन्जाइना  भी हो सकता है इतनी लापरवाही ठीक नही, आप तुरंत डा० के पास इन्हें ले कर जाइये | अगले दिन ये मुझे हृदय रोग संस्थान ले गये वहाँ मेरा चेकअप हुआ और डा० ने बताया कि मुझे दिल की बीमारी है अगर ठीक से इलाज नही हुआ तो मैं कुछ दिन की मेहमान थी ये सुन के मेरे पाँव तले ज़मीन खिसक गयी मैं बाहर आ के रोने लगी, अभी तो मेरी सारी गृहस्ती अधूरी थी, मेरा घर अधूरा था, मेरी सारी जिम्मेदारियां यूँ ही पड़ी थी मेरी आँखों के सामने अन्धेरा छा गया था | मै कुछ दिन हास्पिटल मे रह कर घर आ गयी थी और अब मैं अपने शरीर से लाचार हूँ कुछ भी नही कर सकती कमजोरी की वजह से, इसी लिए मुझे इस लड़की को बुलाना पड़ा पर आज कल कोई भी अपना नही, कह कर बेबी ने एक लम्बी सांस ली और मुझसे पानी का इशारा किया मैंने उठ कर पानी का गिलास उसको पकड़ा दिया पानी पी कर फिर से उसने बताना शुरू किया | मुझे भी सब जानने की उत्सुकता थी सो मैं भी बैठ के सुनने लगी जब की शाम हो चली थी घर आने को देर हो रही थी पर उसकी बात बीच मे ही छोड़ कर मैं कैसे आ सकती थी |
उसने फिर से कहना शुरू किया .................................
कुछ दिनों से मैं कुछ अजीब सा महसूस कर रही हूँ सुमी मैंने पूछा - क्या ? वो बोली इनमे (पति) और अन्दर की तरफ़ इशारा करते हुए इसमें  कुछ चल रहा है |
मैं बोली 
 तेरा दिमाग खराब हो गया है, पगला गयी है तू, क्या ऊट-पटांग सोचती रहती है, उम्र देखी है दोनों की, चुप कर....... आगे कुछ भी मत बोलना |
वो बेबस सी रोने लगी मैंने उसे चुप कराया | अचानक से ऐसी बात सुन के मुझे गुस्सा लग गयी थी और मैंने उसे डांट दिया था, अब मुझे अपनी गलती का एहसास हो रहा था | मैंने बड़े प्यार से पूछा उससे, 
ऐसा तू कैसे सोच सकती है, बता मुझे क्या बात है | मुझे भी लगा की आज तक उसने अपने पति के बारे मे ऐसा कुछ भी नही कहा था आज क्या हो गया | उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोली सुमी ये सच् है, मैंने भी ये बात तुझसे यूँ ही नही बोल दी, अपनी आँखों से सब कुछ देखा मैंने | ये दोनों मिल कर मेरा कितना ध्यान रखते हैं; ये सोच कर मै मन ही मन कितना खुश होती थी पर कारण कुछ और ही है | कुछ दिन पहले की बात है मुझे नींद की दवा देने के बाद इन्होने उसे दूसरे कमरे मे आने का इशारा किया, मै अध्बेहोशी मे थी होश आने पर मुझे ये बात याद आई, मैंने सोचा ये मेरा भ्रम है पर मेरे दिल मे शक का कीड़ा काट गया| उस दिन से मै इन दोनों के हाव-भाव पर नजर रख रही हूँ पर ये लोग मुझे दवा दे कर सुला देते हैं | एक दिन मुझसे रहा नही गया तो मै इनका हाथ पकड़ के माता रानी की फोटो के पास ले गयी और अपने सिर पर इनका हाथ रख कर पूछा मैंने कि सच् बताओ तुम दोनों मे क्या चल रहा है, अगर तुमने झूठ बोला तो मुझे दुबारा दिल का दौरा पड़े और मै मर जाऊँ, तब इन्होने बड़े प्यार से माँ के सामने मेरी कसम खा के मुझे विश्वास दिलाया था कि ये सब मेरा वहम है ऐसा कुछ भी नही है | मैंने भरोसा कर लिया पर दिल मे कहीं कुछ चुभ रहा था |अभी तीन-चार  दिन पहले की बात है मैंने सोचा आज इन दोनों की सच्चाई जान के रहूँगी उस दिन रात को मुझे दवा दी गयी मैंने सिर दर्द का बहाना कर के कहा कि "रख दो अभी थोड़ी देर मे खा लूँगी |" मैंने वो दवा छुपा दी और सोने का नाटक करने लगी | वो मेरे पास सोती है और ये दूसरे कमरे मे | वो चुप हो गई, शायद बोलते-बोलते थक गई थी | मै सांस रोके उसकी बातें ध्यान से सुन रही थी | जैसे-जैसे वो आगे बताती जा रही थी मेरा दिल तेजी से धड़कने लगा था | मैंने पूछा फिर क्या हुआ ?
वो बोली 
  करीब १२ बजे रात को मेरे कमरे का पर्दा हटा मैंने जरा सी आँख खोल के देखा यही थे | अन्दर आ कर लाइट ऑन कर के इन्होने मुझे देखा मैं सो रही हूँ कि नही मुझे चादर ओढ़ाया और जब इन्हें विश्वास हो गया कि मैं सो रही हूँ तब ये उसका हाथ पकड़ के दूसरे कमरे मे ले गये | मैं गुस्से और अपमान से थर-थर काँप रही थी पर इतनी हिम्मत नही हुई मेरी कि मै उठ कर दूसरे कमरे मे जा कर देखूँ इन दोनों को | इन दोनों की हँसने की आवाज मेरे कानो मे गरम सीसे की तरह पड़ रही थी | मुझे इनकी झूठी कसम भी याद आ रही थी जो इन्होने मेरे सिर पर हाथ रख के माँ के सामने खाई थी | गुस्से और कमजोरी के कारण मैं बिना दवा के ही बेहोश हो गयी | सुबह आँख खुली तो लगा कि कोई बुरा सपना देख लिया है मैंने | अपनी आखों पर विश्वास नही हो रहा था सुमी|” और वो सिसक पड़ी |
मैं उसके सिर पर हाथ फेरने लगी, मेरे मुंह से एक शब्द भी नही निकला मैं सोचने लगी भाई साहब करीब ४५ के होंगे पर देखने मे वो ३५ के ऊपर नही लगते हैं और ये लड़की भी तो २८ से कम की नही है तो क्या जो बेबी कह रही है वो सब ................
मेरा दिमाग चकरा गया | वो अब भी सिसक रही थी, मैंने कहा 
उसे भेज क्यों नही देती यहाँ से और किसी को बताती क्यों नही ये सब बात |
जब मुझे ही विश्वास नही हो रहा इस बात पर तो कोई भी विश्वास नही करेगा मुझ पर, सब मुझे झूठा साबित कर देंगे और इसे अगर भेज दूँ तो घर कौन सम्भालेगा | मैं बिस्तर पर हूँ, इनकी नौकरी है, बेटे का स्कूल है सब कौन देखेगा | अब तो मैं खुद को तसल्ली दे रही हूँ कि अगर मैं मर गयी तो कम से कम ये मेरा घर तो सम्भाल ही लेगी इसी लिए अब मैंने इन दोनों पर नजर रखना भी बंद कर दिया है, माँ के हवाले कर दिया है सब कुछ, जैसी उसकी मर्जी | बोल कर बेबी ने मेरी तरफ पीठ कर ली | मैं समझ गयी कि अब वो कुछ नही बोलेगी |
थोड़ी देर मैं वहीं बैठ कर उसके बालों मे उंगुली करती रही और सोचती रही कि 
 कितना हँसता खेलता परिवार था बेबी का ना जाने किसकी नजर लग गयी | मैं क्या करूँ उसके लिए, किसी और को ये सब बताना भी उचित नही था जब बेबी ही नही बता रही थी तो मैं कैसे बताती | इसने तो परिस्थितियों के हवाले कर दिया है खुद को मैं क्या करूँ इसके लिए | मै सोच ही रही थी कि इतने मे बाइक रूकने की आवाज आई | मैं समझ गयी कि भाई साहब आ गये मै नफरत से भर गयी, मैंने बेबी के बालों से अपना हाथ हटाया और चुपचाप उठ के निकल गयी उसके घर से, बेबी भी शायद सो गयी थी | एक तो दिल की बिमारी ऊपर से दिल पर इतना बड़ा बोझ ले कर वो कब तक ज़िंदा रहेगी | यही सब सोचते हुए मैं भारी कदमों से अपने घर आ गयी थी |
इस बात को करीब १० दिन हो गये थे | इधर ठण्ड बहुत पड़ रही थी जाड़ों मे दिन छोटे और काम ज्यादा हो जाता है इसी वजह से इधर मैं बेबी को देखने नही जा पाई थी और आज सुबह-सुबह ही मेरी एक दूसरी फ्रेंड का फोन आ गया उसने बताया कि 
कल रात बेबी को अटैक पड़ा और हस्पताल ले जाते हुए रास्ते मे ही उसके प्राण निकल गये |
मैं उसी समय उठ कर उसके घर भागती चली गयी | वहाँ जा कर मैंने देखा कि वो ज़मीन पर शांत लेटी है कोई हलचल नही, सभी दुःख - दर्द  से छुटकारा मिल गया था उसे | मैं उसका हाथ पकड़ के फूट-फूट कर रो पड़ी | मेरे दूसरी सखियों ने मुझे सम्भाला फिर उसे नहला धुला के लाल रंग की साड़ी पहनाई गई, उसका पूरा श्रृंगार किया गया | उसका चश्मा ला कर उसे पहना दिया गया फिर भाई साहब को पकड़ कर लाया गया उन्होंने उसकी मांग भरी मुझे लगा की उनका मुंह नोंच लूँ पर अपने गुस्से पर काबू रखा मैंने | उनकी अच्छी खासी छवि थी समाज मे कोई भी मुझपे विश्वास नही करता | बेबी की मांग भरने के बाद वो भी उसके चेहरे पर अपना चेहरा रख के फूट फूट कर रो पड़े थे वहाँ उपस्थित सभी लोगों की आँखों मे आँसू थे |
इतने दिनों की बीमार बेबी आज कितनी सुन्दर लग रही थी, लग ही नही रहा था कि वो बीमार थी , ऐसा लग रहा था कि तैयार हो के सो गयी है बेबी | फिर उसे लाल चुनरी ओढा दी गयी सिर से और वो पति के कंधे पर चढ़ के विदा हो गयी इस दुनिया से | अपने साथ अपने पति की बेवफाई भी ले गयी थी, समाज मे उसका सम्मान बचा गयी थी बेबी पर खुद उसकी बेवफाई का दर्द सह नही पायी और विदा हो गयी इस दुनिया से |
मेरी हिचकियों की आवाज से ये जाग गये थे | मेरे पास आ कर बोले 
तुम सोयी नही ? कब तक रोती रहोगी संभालो खुद को, अब तुम्हारी सखी वापस तो नही आ सकती, हिम्मत से काम लो तुम्हारी तबियत खराब हो गई तो क्या होगा | इन्होने समझा बुझा के मुझे चुप कराया और रजाई ओढा के सुला दिया |
समय बीतने लगा, जब भी बेबी की याद आती दिल दर्द से भर जाता और आँखों से आँसू निकल पड़ता पर कर क्या सकती थी मैं, ईश्वर के आगे किसकी चलती है |  धीरे 
 धीरे समय बीतता रहा और साल निकल गया |
आज फ़रवरी की वही तारीख थी जब बेबी इस दुनिया को छोड़ गयी थी | आज सुबह से ही मेरे आँसू नही रुक रहे थे | बेबी के बाद मैंने कभी भी उसके घर का रुख नही किया था एक तो बेबी के बिना मैं उस घर की कल्पना भी नही कर सकती थी दूसरा मुझे उसके पति से नफरत हो गयी थी पर आज तक मैंने वो बात किसी को भी नही बताई थी, वादा जो ले लिया था बेबी ने | घर का सारा काम निपटा कर मैं अपनी दूसरी सखी, जो उसी के मुहल्ले मे रहती थी उसके घर के लिए निकल पड़ी | वो भी उदास थी हम दोनों थोड़ी देर बेबी को याद कर के आँसू बहते रहे फिर मैंने ही उससे पूछा 
भाई साहब (बेबी के पति) आज कल कहाँ हैं | उसने आँसू पोंछते हुए आश्चर्य से कहा अरे !! तुझे नही पता क्या ? मै चौंक कर बोली  नही तो ...... क्यों क्या हुआ ?
अभी पिछले महीने ही तो मंदिर मे उनकी शादी कराई गयी है, बेचारे कितना रो रहे थे, बिल्कुल भी तैयार नही थे शादी के लिए पर सभी रिश्तेदारों ने समझा बुझा के  शादी कराई उनकी | लड़की भी तो बेबी की बहन लगती थी उसके बेटे को अपने बेटे की तरह रखती है, बेबी की गृहस्ती अच्छे से सम्भाल रखी है उसने | अच्छा ही हुआ नही तो अभी भाई साहब की उम्र ही कितनी थी आगे जा कर कही कुछ ऊँच  नीच हो जाता भाई साहब से तो बेबी का घर बिगड़ जाता उससे तो अच्छा हुआ कि सबने कह सुन के उनकी शादी करा दी |
वो बेले जा रही थी और मैं सोच रही थी कि 
कितना बड़ा फरेबी है बेबी का पति उसके इसी फरेब की वजह से बेबी इस दुनिया से असमय ही चली गयी और ये कितना शरीफ़ और सज्जन बन के बैठा है | मेरा मन खराब हो गया ये सब सुन कर | मैं उसके घर से निकल पड़ी और मन ही मन निश्चय किया कि अब कभी वो बेबी के मुहल्ले मे भी कदम नही रखेगी, बेबी उसके दिल में है और हमेशा रहेगी |   


मीना पाठक
चित्र-गूगल     
  


  

Saturday, November 2, 2013

इस दीपावली एक संकल्प लें

समाज की अति व्यस्तता में मगन हम आनंद का अनुभव करने के लिए विशेष अवसरों की खोज करतें हैं | त्यौहार उन विशेष अवसरों में से एक है | ये हमारे जीवन में नयापन लाते हैं, आनन्द और उल्लास पैदा करते हैं | हमारे त्योहारों में दीपावली का विशेष स्थान है | दीपावली का साधारण अर्थ दीपों की पंक्ति का उत्सव है और दीपक का प्रकाश ज्ञान और उल्लास का प्रतीक है |
दीपावली कब और क्यों मनाया जाता है ये तो हम सभी जानते हैं | इसके बारे में अनेक सांस्कृतिक,ऐतिहासिक एवं धार्मिक परम्पराएं और कितनी कहानियां प्रचलित हैं ये भी हम सब जानते हैं | इस दीपावली पर मै किसी और तरफ़ आप सभी का ध्यान आकर्षित करना चाहती हूँ |
दीपावली खुशियों का त्यौहार, दीपों का त्यौहार और सबसे बढ़ कर लक्ष्मी के स्वागत का त्यौहार है | घर-घर में साफ़ सफाई हो रही है | घर का हर कोना साफ़ किया जा रहा है, दीवारों को चमकाया जा रहा है लक्ष्मी के स्वागत के लिए | पर क्या अपना मन भी इसी तरह साफ़ किया जा रहा है या साफ़ किया जा सकता है ? अगर ऐसा हो जाए तो लक्ष्मी सदैव के लिए ही घर में रुक जायें | घर की सफाई से ज्यादा जरूरी अपने हृदय रुपी घर की सफाई है जिसकी दीवारें घर की लक्ष्मी के लिए मान,सम्मान और प्रेम की भावना से रंगी हों और उसकी मुस्कुराती हुई तस्वीर हर दीवार पर टंगी हो ऐसे घर में तो लक्ष्मी के साथ नारायण भी वास करना चाहेंगें और जहाँ नारायण का वास हो वहाँ से लक्ष्मी भला कहाँ जा सकती हैं | इसके विपरीत जिस घर में गृहलक्ष्मी आँसू पोछती रहती है, घुटती रहती है उस घर को लाख साफ़ करो पर लक्ष्मी वहाँ से दूर ही रहती हैं | लक्ष्मी मिट्टी की मूर्ती में वास नही करतीं वो वास करती है जीती जागती गृहलक्ष्मी में जिसका एक बार स्वागत कर कर के आप सैकड़ों बार उसकी आत्मा के साथ बलात्कार करते हो | जिस घर में स्त्री का सम्मान नही होता वहाँ दलिद्रता का वास होता है | नाना विधि से मूर्ती के सामने फल,फूल और मिठाइयाँ अर्पित करने से लक्ष्मी प्रशन्न
नहीं होतीं हैं | अपना अंतर्मन निर्मल हो और उसमे स्त्री के प्रति सम्मान की भावना हो तो माँ लक्ष्मी सहित सभी देव प्रशन्न होते हैं | इस दीपावली लक्ष्मी पूजन के समय शपथ लें की अपनी गृहलक्ष्मी को सम्मान देंगे, और सभी स्त्रियों के प्रति सादर भाव रखेंगे. कन्या भ्रूणहत्या नही होने देंगे  तभी आप की, हमारी और सभी की दीपावली मंगलमय होगी | जहाँ स्त्री का सम्मान होता है वहीं लक्ष्मी का वास होता है | इसी लिए कहा गया है कि -- 

                   यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते,रमन्ते तत्र देवता: ||

आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ
सादर

Saturday, October 12, 2013

परायाधन (लघुकथा)

रमाकांत को पचास वर्ष की आयु में सात पुत्रियों के बाद पुत्र रत्न की प्राप्ती हुयी थी | आज बेटे की छठी बड़े धूमधाम से मनाई जा रही थी | मित्रों और रिश्तेदारों से घर भरा हुआ था कहीं तिल रखने की भी जगाह नही थी घर में | महिलाएँ बधाई गीत गा रहीं थीं | रमाकांत सपत्नी खुशी से फूले नही समा रहे थे | बेटियाँ चुपचाप ये सब देख रहीं थीं | सबसे छोटी बेटी जो मात्र तीन वर्ष की थी अपनी सबसे बड़ी बहन की गोद में बैठी थी | सभी बहने देख रहीं थी कि कैसे सभी उसके नन्हें से भाई को गोद में ले कर स्नेह दिखा रहे थे | माँ पापा भी खुश थे | अचानक ही एक बहन बोली दीदी हमारे जन्म पर भी ऐसे ही खुशी मनाई गई होगी ना ? बड़ी बहन उसके सिर पर प्रेम से हाथ फेरते हुए बोली ना रे दादी कहती है की बाबू (नन्हा भाई) से ही इस घर का वंश चलेगा, हम सब अपने घर का वंश चलाएँगी |
तो क्या ये हमारा घर नही है ? छोटी बहन ने उत्सुकता से पूछा |
दादी कहती है कि हम सब परायाधन हैं, ये हमारा अपना घर नही है | छोटी बहन उदास हो कर अपनी दादी को देखने लगती है जो पोते की बलईयाँ लेते नही थक रही है |

मीना पाठक

चित्र -- गूगल  

Friday, October 11, 2013

माँ तुम हो कितनी महान




माँ!
गहरी सागर सी
ऊँची अनन्त सी
घुली पवन में
सुगंध सी
माँ!
हृदय तुम्हारा
कोमल फूलों सा
मिश्री सी वाणीं
लोरी, परियों की कहानी
माँ!
सुन्दर इतनी कि
अप्सराएँ शर्माएँ
आँचल में तुम्हारे
सागर ममता का
लहराये

महानता में ईश्वर भी
पीछे रह जाए
माँ!
स्पर्श में तुम्हारे
मिलता असीम सुख
हृदय से लग के
मिटता संताप, दुःख
माँ!
तुम मेरी शक्ति
आत्मविश्वास,
श्रोत प्रेरणा की
मेरी पथप्रदर्शक
माँ!
तुम हो मेरे लिए
शक्ति का वरदान
चरणों में तुम्हारे
बारम्बार प्रणाम
तुम ही तो हो
मेरी भगवान!
माँ!
तुम हो कितनी महान ||

Wednesday, October 2, 2013

नजरिया बहुओं के प्रति

आज बहुत दिनों बाद मै मिश्रा जी के घर जा रही थी | उनके चार बच्चें हैं, दो बेटे और दो बेटियाँ  | दोनों बेटे बड़े हैं बेटियों से, दोनों की शादी हो चुकी है,दोनो बहुएं पढ़ी-लिखी होने के बावजूद घरेलू जीवन बिता रहीं हैं उन्हें कुछ करने की आजादी नही है जब कि लगभग उनकी हमउम्र ननदें पढ़ाई पूरी कर के जॉब कर रहीं हैं | अभी पिछले महीने ही बड़ी की शादी हुई है | छोटी अभी है शादी के लिए, वो एक कोलेज में इग्लिश की प्रोफ़ेसर है और कोचिंग से भी उसको बहुत आमदनी है तो घर में उसकी तूती बोलती है | बिना उससे पूछे घर में कोई निर्णय नही लिया जाता है और बहुएँ ... कोई दीदी के नहाने के लिए पानी गर्म कर रही है तो कोई जल्दी-जल्दी नाश्ता बना रही है | दीदी के नहा के आते ही उनकी साड़ी स्त्री की हुई रख दी जाती है, नाश्ता मेज पर लग जाता है, उनका पर्श उनका मोबाइल उनकी जरुरत का हर सामान उनके सामने हाज़िर हो जाता है उसके बाद ठाट से दीदी तैयार हो कर घर से निकल जातीं हैं | यही सब सोचते हुए मै उनके घर पहुँच गई |
मिसराइन चाची ने ही गेट खोला मैंने उनका पैर छूआ  वो भी मुझे देख कर खुश हो गईं, मै भी खुशी-खुशी अन्दर जा कर सोफे पर बैठ गयी | चाची ने आवाज लगाईं
अरे तनी आ के देखा लोगिन के आईल बा, तोहा लोगिन के सुत्ते के अलावा कउनो काम नइखे.. आवाज देने के बाद मुझसे मुखातिब हो कर चाची कहने लगी दिनवा भर सुत्ते ला लोग, का जाने केतना नींद आवेला ये लोगिन के| मैंने हँस के कहा अरे चाची जी, सोने दीजिए, आप हैं ना मेरे पास, वो थक गयीं होंगी काम कर के | चाची मुझे बहुओं का पक्ष लेते हुए देख कर थोड़ा तल्खी से बोली कवन काम बा घरवा में, गैस पर खाना बनावे के बा, स्टील के बर्तन धोवे के बा और मिश्रा जी जमीनिया पर टायल लगवा दिहले बानी कऊन  बड़ा मेहनत के काम करेला लोग, अरे काम त हम करत रहनी चूल्हा पर पुयरा झोंक-झोंक के खाना बनावत रहनी और फूल-पीतल के बर्तन माजत-माजत अऊर गोबर लीपत-लीपत कमरिये टूट जात रहे, तब्बो सास रानी के मुंह सीधा नाही रहे तौनो पे दुई चार ननद लोग धमकल रहत रहे लोग चाची की बातें सुन के मुझे उलझन हो रही थी, चाची पुराण शुरू हो गया था,कहाँ से कहाँ मै आ गयी अभी सोच ही रही थी कि अन्दर से उनकी एक बहू मुस्कुराती हुई आ गयी मैंने चैन की सांस ली | मैंने भी मुस्कुराते हुए पूछा कैसी हो ? वो कुछ बोलती इससे पहले ही चाची गुस्से में बोलीं बांस अईसन ठाड़ रहबू की गोड़ छुअबू ..वो बेचारी जल्दी से मेरे पैर छूने लगी मैंने उसे अपने पास बैठा लिया | चाची का चेहरा बदल गया था | दो मिनट बाद ही बोलीं चाची जा, जा के उनहूँ के जगा द और कुछु ले आवा चाय पानी और हाँ गितवा आवत होई उनहूँ के खातिर कुछू बाना लीह बेचारी बिहाने के निकलल अब आवत होई | मैंने देखा  बेटी का नाम आते ही उनके चेहरे से ममता टपकने लगी थी | मैंने बड़ी बेटी के बारे में पूछा तो चाची ने बड़े खुश होते हुए बताया कि वो तो दामाद के पास चली गयी | मैं उनके बदलते रूप को देख - देख कर घुट रही थी बहुओं से हमदर्दी होते हुए भी मै कुछ भी नही कर सकती थी | उनके बेटे अभी इतना नही कमा पा रहे थे कि अलग कहीं फ़्लैट ले कर रह सकें शायद इसी लिए वो ये सब सहने को मजबूर थीं | सब से मिल मिला के थोड़ी देर बाद मै घर आ गयी | घर आ कर फेस बुक खोला तो एक सुन्दर सी कविता बेटी पर मेरे सामने थी | मुझे फिर से चाची याद आ गयीं मैंने फेस बुक बंद किया और लिखने बैठ गई |

  आज ना जाने क्यों कुछ अलग सा लिखने को दिल कर रहा है | नहीं, इसे अलग नही कह सकते ये तो घर-घर की कहानी है | मै हमेशा फेसबुक या किसी पत्रिका में या किसी भी बेबसाईट पर बेटियों या बहनों के लिए कविता पढ़ती हूँ | बेटियां घर की शोभा हैं, बेटियाँ परिवार में हर एक के दिल की धडकन हैं, बेटियों से घर की बगिया खिली है तो बेटिओं से घर रोशन है आदि आदि ..पर मेरा सवाल ये है कि अगर बेटियां इतनी प्यारी हैं तो बहुए क्यों नही ? हम बेटियों को तो इतना प्यार देते हैं उनकी हर जरुरत का ख्याल रखते हैं उनको सम्मान देते हैं, अपनी हर जरुरत को दर किनार करते हुए उनकी हर एक जरुरत पूरी करते हैं तो बहुओं की क्यों नही ? क्या वो किसी की बेटियां नहीं हैं क्या वो हमारा कर्जा खा कर हमारे घरों में प्रवेश करती हैं ? उनके आते ही भारी-भरकम चाभियों का गुच्छा उनके हवाले कर दिया जाता है हलाकि अब ये फिल्मों तक ही सीमित रह गया है | अब ये गुच्छा सासों की कमर में ही रहता है हाँ रसोई उनके हवाले कर दिया जाता है |
बेटियाँ चाहें कितनी भी बड़ी हों पर माता-पिता को बच्ची ही लगती हैं और अगर उसी के उम्र की बहू घर में है तो वो हम सब को क्यों बच्ची नही लगती ? उसके ऊपर हम अपने बच्चों की भी जिम्मेदारी क्यों डाल देतें हैं ? एक ही उम्र की बेटी और बहू दोनों में कितना बड़ा अंतर होता है, एक कोलेज़ जाती है तो दूसरी पढ़ी-लिखी होते हुए भी रसोई में पसीने बहाती है, क्यों ? हम माँ-बाप तो वही रहते हैं फिर हमारा नजरिया दूसरी बेटी के लिए क्यों बादल जाता है | वो बेटी जो हमारे बेटे का हाथ पकड़ के अपना सब कुछ पीछे छोड़ कर हमे अपनाती है और उसी के प्रति हमारा बर्ताव कैसा होता है ? ये सोचने का विषय है | बेटे को तो हम जी-जान से चाहते हैं और उसकी पत्नी को हम जीवन भर अपना नही पाते क्यों ?
अपनी बेटी पर ममता की गंगा बहा देने वाले दूसरे की बेटी के साथ इतना क्रूर कैसे हो जाते हैं कि उनको प्रताड़ित करने के लिए किसी भी हद तक चले जाते हैं | कहते हैं कि बेटियाँ कहीं भी रहें माँ-बाप से दिल दे जुड़ी रहती है ये सच् भी है पर क्या बहुएं हर दुःख-सुख में हमारा साथ नही निभातीं ? क्या कोई भी बेटी अपना घर अपने बच्चे छोड़ के हमारी सेवा के लिए हमारे पास आ कर दो-चार महीने रहती है, नही ना .. बहू ही करती है सब फिर भी हम उसे बेटी नही मानते, ठीक होते ही उसकी खामियां गिनने लगते हैं और अपनी बेटी दो दिन के लिए देखने आ गयी तो उससे बहू की हजार बुराइयां बताते हैं, ऐसा क्यूँ ?
मैंने कई घरों में बेटियों का बर्चस्व देखा है | घर में उन्ही की चलती है और घर की बहू दौड़-दौड़ के उनकी सेवा में लगी रहती है, दीदी ये,दीदी वो ...
अपनी बेटियों के लिए हम छोटा परिवार ढूंढते हैं जब की हमारे खुद के आधे दर्जन बच्चे होते हैं | अपनी बहुओं से हम चाहते हैं की वो घर का सारा काम करे सास-ससुर का ध्यान रखे, ननद की हर जरुरत का ख्याल रखे, देवर की जिम्मेदारी माँ की तरह निभाए पर अपनी बेटी जल्दी से जल्दी दामाद के साथ चली जाए यही चाहते हैं हम, ये दोहरापन क्यों ?

मैं मानती हूँ कि बेटियाँ हुत प्यारी होती है और ये सच् भी है कि बेटियाँ चाहे जितनी भी दूर रहें माता-पिता से जुड़ी रहतीं हैं पर हमारी बहुएं भी कुछ कम नही | अपने माता-पिता, भाई-बहन को छोड़ के हमारे घर आतीं हैं और आते ही हमारा हर सम्भव ख्याल रखना शुरू कर देती हैं, हर तरह से हमें खुश रखने की कोशिश करती हैं फिर हम उन्हें खुश क्यों नही रख पाते | हम बेटियों की इच्छाओं का कितना खयाल रखते हैं तो अपनी बहू की इच्छा का आदर क्यों नही करते | घर का काम बहू-बेटी दोनों मिल कर भी तो कर सकती है ना फिर सारा बोझ एक ही पर क्यों ?
आज जरुरत है मिसराइन चाची जैसे लोगों को अपना नजरिया बदलने की, बेटी और बहू के अंतर को खत्म करने की | अगर बेटी जॉब कर सकती है तो बहू क्यों नही और अगर बहू घर का काम कर रही है तो बेटी उसके काम में हाथ क्यों नही बटा सकती | बेटियों का वर्चस्व जब घर में बढ़ता है तब घर में क्लेश पैदा होता है | अगर हम दोनों को समान अधिकार देंगे और दोनों को एक समान स्नेह देंगे तो मुझे नही लगता कि कभी क्लेश की स्थिति उत्पन्न होगी और ये हमारे खुद के हाथ में हैं | बेटियों की तरह हमारी बहुएँ भी अनमोल हैं |

||मीना पाठक|
|

चित्र - गूगल




Monday, September 30, 2013

जीवन के रेगिस्तान में
















जाने कितने बसंत
शीत,पतझड़, सावन
आये गये
तपती,भीगती,ठिठुरती
मुरझाती पर फिर भी
चलती रही अनवरत
हाँफती,दौड़ती,पसीजती
डोर अपनी साँसों की पकड़े
कोलाहल अंतर का समेटे
मूक, निःशब्द बस्
अपने काफिले के साथ
बढ़ती ही गई जीवन के पथ पर !!

अपनी साँसें संयत करने को
रुकी इक पल को
पीछे मुड़ कर देखा जो
छोड़ गये थे सभी मुझको
मेरे पीछे था अब सुनसान
आगे वियावान
नीचे तपती रेत
ऊपर सुलगता आसमान
बीच में झुलसती मैं
अकेली जीवन के रेगिस्तान में ||
  *****

Thursday, September 26, 2013

माँ तुम्हारा कर्ज चुकाना है

















नौ महीने
अपनी कोख में सम्भाला
पीड़ा सहकर
लायी मुझे दुनिया में
जानती हूँ
बहुत दुःख सह, ताने सुन
जन्म दिया मुझे

मैंने सुना था, माँ!
जब बाबा ने तुम्हें धमकाया था
कोख में ही मारने का
दबाव बनाया था
दादी ने क्या-क्या नही सुनाया!
पर तुम!
न डरी, न झुकी
मुझे जन्म दिया

हमारे होते भी
तुम निपूतनी कहलाई
पर तुम्हारे
प्यार में कमी न आई

तुम्हारे आँसुओं का
मोल चुकाना है
बेटी के जन्म से
झुका तुम्हारा सिर
गर्व से उठाना है
माँ! तुम्हारा कर्ज चुकाना है ||

मीना पाठक
चित्र -- साभार गूगल 

Friday, September 20, 2013

कराहती ज़िंदगी













रात के अँधेरे में कराहती हुई सुलोचना करवटें बदल रही थी | शरीर का कोई भी हिस्सा ऐसा नही था जहाँ चोट से काला निशान ना पड़ा हो जिस करवट भी सोती दर्द से कराह उठती थोड़ी देर बाद उठ के बैठ गयी और सोचने लगी "आखिर कब तक सहती रहूंगी ये सब प्रताड़नायें, झूठे आरोप, अब तो हद हो गयी है बर्दास्त के बाहर हैं मेरे, नहीं होता ये सब सहन अब, तो क्या करूं कहाँ जाऊँ, मायके से विदा होते समय यही तो कहा था माँ ने कि अब वो ही तुम्हारा घर है, यहाँ से डोली में जा रही हो वहाँ से अर्थी पर निकलना |" सुलोचना के सामने अंधेरा ही अंधेरा था,कहाँ जाए, बहार भी तो भेड़ियों का झुण्ड है, आत्महत्या कर सकूँ इतनी भी हिम्मत भगवान् ने नही दी मुझे, तो कहाँ जाऊं | कुछ समझ में नहीं आ रहा था और अब इस इंसान के साथ जीना मुश्किल था जो उसे इंसान नही जानवर समझता था |अचानक कुछ सोचते हुए उसकी आँखे चमक उठी और वो जोर जोर से हँसने लगी, अपने बाल नोचने लगी, अपना सिर दीवार पर जोर-जोर से मारने लगी | शोर सुन के घर के सभी लोग उसके कमरे में आ गए | जो सुलोचना सब कुछ चुपचाप सह लेती थी और बंद कमरे में आंसू बहाती थी उसी सुलोचना का ये रूप देख कर सभी दंग थे |
दो दिन बाद ही सुलोचना के दरवाजे पर एक एम्बुलेंस आ कर खड़ी हो गयी, उसमे से कुछ लोग उतर कर सुलोचना के कमरे की तरफ बढ़ गए | एम्बुलेंस पर लिखा था "मानसिक रूप से बिक्षिप्त रोगियों के लिए |"
|मीना पाठक|

Friday, September 13, 2013

हिन्दी हमारी मातृभाषा







हिन्दी हमारी मातृभाषा
हिन्दी हमारा मान है
हिन्दी से हम हिंदी हैं
देश हिन्दोस्तान है
भूल बैठे फिर क्यूँ हिन्दी हम
अंग्रेजी अपनाया है ...
इकदूजे से बोलचाल का
माध्यम उसे बनाया है
अंग्रेजों की अंग्रेजी अब भी
हम पर हावी है
अपनी हिन्दी को हमने
ही कहा बेचारी है
चलो उठो संकल्प करो
हिन्दी में लिखना पढना है
हिन्दी का गौरव सम्मान
बाइज्जत वापिस करना है
अपने नौनिहालों को हिन्दी
का पाठ पढ़ाएंगे
हिन्दी हमारी मातृभाषा है
ये घूटी पिलायेंगे
वही बड़े हो कर कल
हिन्दी का मान बढ़ाएंगे
हिन्दी का खोया सम्मान
उसे वापिस दिलाएंगे ||

हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ !! 

||मीना पाठक||

चित्र -- गूगल
 



 



नजरिया हिन्दी पर

कल से ही तबियत कुछ ठीक नहीं थी इस लिए आज सुबह सुबह ही हॉस्पिटल के लिए निकल गई  वहाँ पहुँची तब तक भीड़ बहुत हो चुकी थी, अपना कार्ड  जमा कर के मैं आराम से बैठ गई | किसी को छींक भी आ गयी तो चलो दावा ले आते हैं, आखिर एयर फ़ोर्स का हस्पताल है फ्री में दवा मिल जाती है
तो लाभ क्यों न लिया जाय, शायद इसी सोच के चलते यहाँ रोज इतनी भीड़ रहती है और बेचारे जो सच में बीमार हैं उनको लंबा इन्तजार करना पड़ता है अपने न. का | करीब एक घंटे बाद मेरा नाम पुकारा गया मैंने जा कर अपना पर्चा लिया, देखा तो ४६ न. मिला था
मैंने सोचा गया आज का पूरा दिन , खैर .. इतनी दूर से आई थी तो सोचा जितना भी समय लगे डा. को दिखा कर ही जाऊँगी सो डा. के केबिन के सामने लगी भीड़ का हिस्सा मैं  भी बन गयी | वहाँ बैठ कर अपने न. का इन्तजार करने लगी | आज का दिन ही मेरे लिए ख़राब था डा. साहिबा
दो मरीज देखती तब तक कोई इमरजेंसी आ जाती और वो उठ कर चली जाती | कोई अपने न. के इन्तजार में ऊंघ रहा था तो कोई अपनी राय दे रहा था " एक ही डा. दोनों काम क्यों देख रही हैं, इमरजेंसी के लिए दूसरा डा. क्यों नही है" कुछ महिलायें एयर फ़ोर्स को कोस रहीं थीं "अरे ! फ्री
में थोड़े ही दवा कर रहे हैं, हम लोगो ने अपना बेटा दिया है, ये लोग हमारे बच्चों से जब चाहे जितना चाहे काम लेते हैं तब ये लोग हमें दवा  की सुविधा दे रहे हैं कोई एहसान नही कर रहे हैं हमारे ऊपर|" मैं  चुप चाप सब देख और सुन रही थी |मेरे सर में कुछ दर्द सा महसूस
हुआ और मैं  वहाँ से उठ कर अन्दर हाल में चली गयी, जो कि हम मरीजों के लिए ही बनाया गया था कि हम आराम से वहाँ बैठ कर अपने न. का इंतजार कर सकें | मैंने हाल में अन्दर जा कर इधर-उधर नजर दौड़ाई तो खिड़की के पास कूलर के सामने एक कुर्सी खली पड़ी थी, बाकी पूरा हाल भरा हुया था
मै जा कर कूलर के सामने बैठ गयी , ठंडी ठंडी हवा का असर हुआ और मुझे झपकी आ गयी | थोड़ी देर बाद बच्चे के रोने की आवाज सुन कर मैं चौंक पड़ी आँखे खोल कर देखा तो मेरी बगल वाली कुर्सी पर एक महिला करीब एक महीने के बच्ची को चुप कराने में लगी थी | बच्ची फूल सी नाजुक
और मलमल सी कोमल थी उसके होठ गुलाब की पंखुड़ियों जैसे लाल थे, मेरा दिल किया कि एक बार उसे छू लूं पर मैंने ऐसा किया नहीं मेरी नींद टूट चुकी थी मैंने धीरे धीरे अपने अगल बगल बैठी महिलाओं से बातें करना शुरू  किया | मैं भी क्या करती बोर जो हो रही थी तो जल्दी ही
हम महिलाओं का एक ग्रुप बन गया हम सभी एक दूसरे के बारे में पूछने लगीं  और अपने बारे में बताने लगीं कि कितने बच्चे हैं,कौन - कौन  सी कक्षा में पढ़ते हैं और किसके पति कहाँ-कहाँ पोस्टेड हैं आदि आदि |घर परिवार की बात होते होते बात बच्चों की  शिक्षा पर आ कर अटक गई | सभी के बच्चे
अंग्रेजी माध्यम से पढ़ रहे थे और सभी महिलाएँ अपने बच्चों के स्कूल के नाम बढ़-चढ़ के बता रहीं थीं | हम लोगो की  बाते वहाँ  बैठे पुरुष भी बड़े ध्यान से सुन रहे थे |एक बुजुर्ग महिला जो बड़ी देर से हमारी बाते सुन रही थी बोली "आज कल कोई भी माता-पिता अपने बच्चों को हिंदी
माध्यम से नहीं पढ़ाना चाहते,  सब अपना स्टेटस मेंटेन करने के लिए बड़े - बड़े अंग्रेजी स्कूलों में अपने बच्चों
 का दाखिला करवाते हैं और अपनी जेब हल्की करते हैं , जहाँ न तो नैतिक शिक्षा दी जाती है न सामाजिक, जिसके फलस्वरूप आज समाज में कितने अपराघ बढ़ गए हैं, शहरों में माता पिता अकेले रहने लगे हैं , बेटे उन्हें पैसे भेज कर अपनी जिम्मेदारी की पूर्ती कर लेते हैं | शिक्षा का पूरी तरह से व्यवसायीकरण हो गया है , बच्चों को सिर्फ पैसे कमाने की सीख दी जा रही है, नैतिक मूल्यों और संस्कारों से इनका कोई लेना देना नहीं है |
वो महिला साँस ले के फिर बोली गार्जियन बड़े गर्व से बताते हैं कि मेरा बच्चा सभी विषय में अब्बल है पर हिंदी में कमजोर  है कितने   शर्म की बात है | हिंदी हमारी मातृभाषा  है और आज के बच्चे उसी में कमजोर हैं ,और माता पिता भी खुश हैं कि मेरा बच्चा सिर्फ हिंदी में कमजोर है, चलेगा पर अगर अंग्रेजी में बच्चा कमजोर हो तो ये नहीं चलेगा उसे ट्यूशन लगवा दिया जाएगा |अपने ही देश में हिंदी के से इतना भेद भाव ?
वो महिला इतना बोल के हम सब का चेहरा देखने लगी, शायद वो अपने प्रश्न का जवाब चाहती थीं | वहां सभी बगलें झाँकने लगे क्यूँ कि थोड़ी देर पहले ही सभी महिलायें अपने अपने बच्चों के इग्लिश मीडियम स्कूलों के नाम बड़े गर्व से बता रहीं थीं, सब चुप थीं मैं भी चुप हो कर बड़े गौर से सभी के चेहरे पढ़ रही थी तब तक वो बुजुर्ग महिला फिर से बोल पड़ीं क्या हिंदी मीडियम स्कूलों में अंग्रेजी की  शिक्षा नही दी जाती है ? प्रश्न करने के बाद जवाब भी उन्होंने खुद ही दे दिया " दी जाती है  और साथ साथ सामाजिक और नैतिक शिक्षा भी दी जाती है , मेरे दो बेटे हैं और वो दोनों हिंदी माध्यम से पढ़े हैं एक डा. है और दूसरा इंजीनियर , बड़े गर्व से महिला ने बताया, मुझे भी सुन के बहुत अच्छा लगा उस महिला की बात से कही न कही मैं भी  सहमत थी क्यों कि मेरा एक बेटा हिंदी माध्यम से पढ़ कर प्रशासनिक सेवा में था  तो दूसरा अंग्रेजी माध्यम से १२वी. में पढ़ रहा था दोनों के अंतर को मै खुद भी देख रही थी, हिन्दी में कम न. आने पर जब भी मैं उसे डांटती, वो बोलता कि "अरे मम्मी हिंदी भी कोई सब्जेक्ट है, तो मैं  उसे समझाती थी कि हिंदी हमारी मातृभाषा है, उसमे तो तुम्हारे पूर के पूरे न. आने चाहिए तो बेटा उल्टे मुझे ही समझा देता कि मम्मी आप भी किस जमाने में जी रही हो
आज कल जिसे अंग्रेजी नही आती उसे कोई नहीं पूछता आप बहार निकलो तब जानो ना, हर जगह इग्लिश की डिमांड  है, सच ही तो बोल रहा था बेटा | एक सेल्समैन भी दरवाजे पर आता है तो वो अंग्रेजी में ही बोलता है |आज की पीढ़ी की ये सोच है हिंदी के प्रति, दुःख होता है कि अपनी मातृभाषा की दुर्दशा है पर इसका जिम्मेदार कौन है क्या ये हमारी जिम्मेदारी नही कि बच्चों को इस बात की गंभीरता समझाई जाय कि जैसे अंग्रेजी पढना जरूरी है वैसे ही हिंदी भी बहुत जरूरी है | हम जब किसी बच्चे को फर्रा टे ेसे अंग्रेजी बोलते देखते हैं तो घर में आ कर अपने बच्चों से बोलते है कि फला बच्चा कितनी अच्छी अंग्रेजी बोल रहा था और एक तुम हो
कि इतना पैसा खर्च करने के बाद भी अंग्रेजी बोलनी नहीं आती तुम्हे हर समय हिंदी में बात करते हो .. अपने बच्चे को हिंदी की  अहमियत समझाने के बजाय हम उसे अंग्रेजी पर ज्यादा ध्यान देने के लिए जोर देते हैं | हमने ही तो हिंदी को बेचारी बना रखा है , हिंदी बोलने में लिखने में और हिंदी में हस्ताक्षर करने
में हमें शर्म आती है तो हिंदी की  दुर्दशा ्क्यों  न हो | अपने ही घर में हिंदी अलग थलग पड़ी है और इसके जिम्मेदार हम ही हैं | हमें अपने बच्चों में  हिंदी के प्रति सम्मान को जगाना होगा ये समझाना होगा कि हिंदी बोलना और लिखना हमारे लिए गौरव की बात है | हिंदी मात्र एक विषय नही हिंदी हमारा मान है | कहते हैं कि घर बच्चे की प्रथम पाठशाला है और माँ प्रथम गुरु तो बच्चे के अन्दर हिंदी के प्रति सम्मान की भावना विकसित करने की पहली जिम्मेदारी हम माँओं की ही बनती है | मैं अंग्रेजी शिक्षा की विरोधी नहीं, भाषा तो कोई भी हो एक दुसरे से जोड़ने का काम करती है पर अपनी भाषा को नकारना या उसे हल्का समझना कहाँ की समझदारी है | दुनिया के हर देश में अपनी - अपनी भाषा बोली जाती है यहाँ तक कि वहां के सरकारी कार्यालयों में भी वहां की ही भाषा में काम होता है पर हमारे यहाँ सरकारी काम भी विदेशी भाषा में होता हैं | यही सब सोचते हुए मैंने एक लम्बी सी साँस ली और उठ कर हाल के बाहर आ गयी | उस महिला का न. शायद आ चुका था , मेरी नजरे उस महिला को ढूंड रही थी पर वो कहीं दिखाई नहीं पड़ी मुझे | मैंने दरवाजे के ऊपर देखा ४० न. चल रहा था मैंने चैन की साँस ली कि थोड़ी देर में मेरा न. आने वाला है , मैं लाइन में खड़ी हो गयी तब तक
जोर से  सायरन की आवाज सुनाई दी एयर फ़ोर्स की वर्दी में सजे सभी छोटे बड़े कर्मचारी दौड़ पड़े, शायद फिर से कोई इमरजेंसी आ गयी थी  |५ मिनट बाद ही डा. साहिबा भी अपनी केबिन से निकल कर उसे देखने चली गयीं | मैं लाइन से हट कर फिर से कुर्सी पर  बैठ गयी अपने न. के इन्तजार में ||


मीना पाठक

Thursday, September 12, 2013

बेटों पर भी निगाह रखना जरूरी

वो बार- बार घड़ी देखती और बेचैनी से दरवाजे  की तरफ देखने लगती  |५ बजे ही आ जाना था उसे अभी तक नही आया , कोचिंग के टीचर को भी फोन कर चुकी उन्होंने तो ४:३० बजे ही छोड़ दिया था पर अभी तक ........
सरोज का दिल बैठा जा रहा था | उसे यूँ परेशान देख कर उसकी सास मुंह बना कर बोली "अरी महारानी बेटा है वो तेरा कोई बेटी ना है जो तू इतनी परेशान है |" सरोज बोली " माँ जी यही उम्र है बिगड़ने और बनने  की इस समय अगर निगाह नहीं रखूँगी तो समय हाथ से निकल जाएगा | आप लोगो ने जीवन भर लडकियों पर रोक लगाया ना जाने कितनी पाबंदियां  लगाई, उन के ऊपर निगाह रखा की वो कब क्या कर रही है, कहाँ जा रहीं हैं और लड़कों को सर पर चाढाया पर अब समय आ गया है की वो सारी  पाबंदियां बेटो पर भी लगाई जाए, उन पर भी निगाह रखा जाय की वो कब और कहाँ  जा रहें हैं क्या कर रहे है,
किस किस के साथ उनका उठाना बैठना है | शाम तक घर में आ जाना है और रात में उन्हें घर से बाहर नही निकलना है ये सारी पाबंदियां  उन पर भी होनी चाहिए | गेट पर खट की आवाज सुन कर सरोज दौड़ कर गेट खोलने आई देखा तो हाथ में फ़ाइल लिए बेटा कुछ डरा हुआ सा सायकिल लिए खड़ा था | सरोज वहीँ शुरू हो गयी " कहाँ थे अभी तक, कोचिंग तो तुम्हारी कब की छूट गयी थी फिर तुम इस समय तक क्या कर रहे थे |  बेटा बोला मम्मी प्रोजेक्ट की फ़ाइल बना रहा था रोहित के साथ उसी के घर में देर लग गयी, उसके पापा मुझे छोड़ने आये है आप चाहो तो उनसे पूछ लो  | सरोज ने देखा स्कूटर पर एक महाशय बैठे हुए थे उन्होंने एक पैर ज़मीन पर टिका रखा था | उन्होंने बताया आप परेशान ना हो ये बच्चा मेरे घर पर ही था, देर हो गयी थी इसी लिए मैं खुद इनके साथ आया हूँ  | ये सुन कर सरोज को तसल्ली हुई | बेटे को हिदायत देती हुयी बोली आगे से ऐसी गलती न हो मुझे पता होना चाहिए कि तुम कहाँ हो और किसके साथ हो | बेटे ने सिर हिला कर हामी भरी तब जा कर सरोज ने उसे अन्दर आने का रास्ता दिया |



मीना पाठक

Friday, September 6, 2013

कोमल एहसास

याद है !!
जब तुम्हारा जन्म हुआ था
एक नर्म तौलिये में लपेट
मुझे तुम्हारी एक
झलक दिखलाई थी
तुम्हे देखते ही
भूल गयी थी दर्द सारा
खों गयी थी
गुलाब की पंखुड़ियों जैसी सूरत में
कितना प्यारा था स्पर्श तुम्हारा
नर्म
बिलकुल रुई के फाहों जैसा
खुश थी छू के तुम्हे

तुम मद मस्त नींद में
लग रहा था
लम्बा सफ़र तय किया है तुमने
कितने दिनों के थके हो जैसे

जब तुमने
आँखें खोली पहली बार
इस नयी दुनिया को देखने की कोशिश
तुम्हारी काली चमकदार आँखें
ढूंढ रही थीं कुछ
मै हर्षित देख रही थी
तुम्हे आँखें घुमाते हुए
जब तुमने
अपना सिर घुमा के
करीब देखा मुझे
एक हल्की मुस्कान के साथ
आँखे बंद कर के सो गये
जैसे तुमने पा लिया था उसे
जिसे ढूंढ रहे थे
मै तुम्हे नींद में मुस्कुराते देख
ऐसे तृप्त हो गयी थी जैसे
बंजर जमीन हो गई हो हरी-भरी
पतझड़ के बाद आ गयी हो बसंत ऋतु
पड़ी हो सूखी धरती पर बरखा की फुहार
आँचल से फूट पड़ी ममता की धार 
तुम्हे अपने आँचल से ढक
कलेजे से लगा कर
मै भी सो गई थी !!....

आज तेरी छवि है मेरे सामने
पर कलेजे से लगाने को तरसती हूँ
आँखों में आँसूओं का समंदर,
हृदय में ममता की लहरें
दूर तु मुझसे और मै तुझसे
मिलेगा कभी ना कभी
यही आस,
यही उम्मीद लिए बैठी हूँ ||!!!

||मीना पाठक ||

चित्र-- साभार गूगल

Thursday, July 18, 2013

जल














जल

इस संसार में समस्त जीवों, पशुओं और पौधे सब को पानी की आवश्यकता है | प्राचीन काल में लोगों ने बस्तियाँ कस्बा, नगर, गाँव, नदियों के किनारे ही बसाये थे ताकि वो जो फसल या पेड़ पौधे लगाएं उसको नदियों से पर्याप्त जल मिलता रहे | पर उन्होंने नदियों की ज़मीन नहीं हथियाई, प्रकृति के साथ छेड़छाड़ नही किया |

जल ही जीवन है | पर जब यही जल प्रलय बन के टूट पड़े तो न जाने कितने जीवन लील लेता है | जब ये जल का जलजला आता है तब अपने साथ तबाही और बर्बादी ले कर आता है चारों तरफ़ चीख पुकार ..इधर-उधर भागते हुए लोग और अपनों को अपने सामने ही जल समाधि लेते हुए देख कर भी कुछ ना कर पाने को विवश लोग और जब जाता है तब अपने पीछे छोड़ जाता है लाशों के ढेर, उजड़ी हुई बस्तीयां, नगर और गाँव, रोते बिलखते लोग | बसे बसाये नगर शमशान में तब्दील हों जाते है |
किसी भी चीज की अधिकता विनाशकारी है नदिया जब तक अपनी मर्यादा में बहें तभी तक जल जीवन है पर नदी में जल का उफान आते ही वो अपने किनारों को छोड़ बाहर आ जाती है और तभी आता है जल प्रलय |
अखिर इसका जिम्मेदार कौन है | हमारी एक इंच ज़मीन कोई ले ले तो हम उसे पाने के लिए ना जाने क्या क्या करते हैं पर हमने इन नदियों की कितनी ज़मीन हड़प ली फिर भी ये सब कुछ सहती हुई शांत बहती रही और हमें जीवन देती रही पर आखिर कब तक वो भी कब तक सहती हमने तो अति ही कर दी | उसके सीने पर होटल, मकान से ले कर दूकान तक बना डाले और उसी की ज़मीन पर जम कर पैसे बनने लगे | हम तो अपनी जेबे भरते रहे पर उसके दिल में कितने छेद हुए ये नही देख पाए और जब वो दर्द नहीं सह पायी तब उसने तोड़ दी सारी मर्यादा और गुस्से से उफनाती हुई पूरे हक से अपनी ज़मीन वापस ले ली | उसने तो अपना हक ही लिया जो हमने उससे छीना था | असली दोषी कौन है हम या वो नदी जिसे सिकुड़ने पर हमने मजबूर कर दिया था | आज उसने फैलाव लिया तो सब छिन्न - भिन्न, चीख पुकार, हाहाकार और विनाश के सिवा कुछ भी हाथ नही लगा |
नदियाँ अपनी मर्यादा में रहें इसके लिए हमे खुद मर्यादा में रहना होगा | उनकी ज़मीन पर अवैध निर्माण, ना जाने कितने जल बिद्दुत परियोजनाएं. बाँध और गंदे नालों का पानी उसमे निरने से रोकना होगा | वृक्ष लगाने होंगे जो विकाश के नाम पर कटते जा रहे हैं | अगर हम अपनी सीमाएं नहीं तोड़ेंगे तो नदियां भी अपनी सीमा में ही बहेंगी | प्रकृति हमें देती है हम से कुछ लेती नही, हम ही प्रकृति के साथ खिलवाड़ करते हैं और उसका खामियाजा खुद ही भुगतते हैं और सारा दोष प्रकृति के सिर मढ़ देते हैं | अलखनंदा व मंदाकिनी ने अपना रौद्र रूप दिखा कर हमें सचेत किया है, हम अब भी ना चेते तो भगवान ही मालिक है |

||मीना पाठक||

चित्र - गूगल  

Tuesday, July 9, 2013

चाह बस् इतना कि
















चाह नही मुझे कि..
मिलूँ तुमसे बागों व बहारों में

चाह नही मुझे कि..
मिलूँ तुमसे नदी के किनारों पे

चाह नही मुझे कि..
तुम छेड़ो बंसी की तान और
झूमती आऊँ मै

चाह नही कि..
तुम बैठो कदम्ब की डाल और
नाच के रिझाऊँ मै

चाह नही कि..
थामूं तुम्हारा हाथ और
निहारूँ तुम्हारी आँखों में


चाह बस इतनी कि..
हे ! नाथ
छू लूँ तुम्हारे
पद पंकज और
हाथ हो तुम्हारा मेरे सिर पर ||

मीना पाठक