Monday, December 31, 2012

रानी दी की व्यथा -मीना पाठक

            रानी दी          



बहुत दिनों बाद मै अपने मायके (गाँव) जा रही थी | बहुत खुश थी मै कि मै अपनी रानी दी से मिलूँगी (रानी दी मेरे ताऊ जी की बड़ी बेटी ) | मै और रानी दी कितना लड़ती थी आपस में पर एक दूसरे के बिना रह भी नहीं पाती थीं | पूरे दस साल बाद हम मिल रहें थे |

अगले दिन सुबह हम ट्रेन से शिवान स्टेशन पहुँच गये | भैया जीप ले कर आये थे स्टेशन,हमें लेने के लिए भैया ने इनके हाथ से अटैची ली और हम तीनो स्टेशन से बहार आ कर जीप में बैठ गये | भैया ने जीप आगे बढ़ा दी |
मै अपने बचपन की यादों में खोती चली गई | कैसे मै और रानी दी खेतों पर हरवाह (हल चलाने वाला ) के लिए खाना ले कर जाया करती थीं और ललचाई हुई नजरों से उसे खाते हुए देखा करतीं थी | लौटते हुए चना,बथुआ और मटर का साग खेतों से खोंट कर लाया करतीं थीं हम दोनों | गेंहू की फसल पर जब द्वार पर गेंहू के बड़े बड़े ढेर लगे होते थे तब हम दोनों बाबा और दादी की नजरों से बच के गेंहूँ चुरा कर गाँव के बनिए की दूकान पर बेच आया करतीं थीं और उस पैसे से लख्खठे (बेसन के मोटे सेव गुड़ में पगे हुए) और गुड़ की पट्टी खरीद के खाया करती थी |

ऐसा नही था कि हम आपस में लड़ती नही थीं |दिन में एक बार लड़ाई जरुर होती थी हम दोनों में | उसके बाद घर में जा कर दोनों डांट खाती थीं |

८ वीं के बाद मै पापा के साथ शहर आ गई थी और दी की १२ वीं के बाद शादी हो गई थी | मै किसी कारन शादी में नही जा पाई थी |

एक झटका लगा और मै अपने बचपन की यादों से बहार आ गई |जीप घर के सामने रुक गई थी |मैंने देखा दोगहा का बड़ा सा दरवाजा पकड़ कर घर की सभी औरतें अंदर से ही मुझे आते हुए देख रहीं थीं | ये बाहर ही ताऊ जी के पास बैठ गये थे | ज्यों ही मैंने चौकठ लाँघ कर अन्दर पैर रखा सभी ने मुझे बड़े प्यार से गले लगाया अंत में मैं और रानी दी गले लग के रो पड़ी |एक लंबे अंतराल के बाद हम दोनों मिले थे ,बहुत खुश थी मैं |
दूसरे दिन मै और रानी दी गाँव घूमने निकल पड़ीं | गाँव का छोटा सा स्कूल अब बड़ा हो गया था |गाँव की कच्ची सड़क पर खडंजा बिछ गया था | तालाब के पास एक बिना छत की कोठारी में पीपल के नीचे शंकर जी रहते थे,अब वो एक सुन्दर मंदिर में विराजमान थे | हम दोनों ने उन्हें प्रणाम किया और आगे बगीचें की ओर बढ़ गये | वहाँ पर हम दोनों एक पेड़ के नीचे आराम से बैठ गईं |

दी ने मेरे से मेरे ससुराल के बारे में सब पूछा मैं बताती चली गई,अब मेरी बारी थी | मैंने पूछा दी आप के घर में सब कैसे हैं, दी बोली सब बहुत अच्छे हैं,मै बोली - और जीजू,वो कैसे हैं ? रानी दी के चेहरे का रंग उतर गया,वो बोलीं - वो भी अच्छे हैं | मेरे दिल में कुछ खटक गया | जरुर कोई बात है,मैंने सोचा और दी से बोली नही कुछ और बात है बताओ ना मुझे हम दोनों एकदूसरे से से कुछ छुपाते थे क्या ? बस .. दी रोने लगीं | उन्होंने जो भी बताया उसकी तो मै कल्पना भी नही कर सकती थी |

रानी दी की शादी एक धनी और प्रतिष्ठित परिवार में हुई थी |ढेर सारी ज़मीन-जायदाद देख कर ही शादी हुई थी दी की |जीजा जी एकलौती संतान थे और क्या चाहिए था बाबूजी (ताऊ जी) को |

दी ने बताया - ये बहुत जिद्दी और गुसैल हैं |जिंदगी अपनी शर्तों पर जीते हैं,मै मरुँ या जीऊँ इनसे कोई मतलब नही |छोटी-मोटी बात पर हाथ उठाना वो अपनी मर्दानगी समझते हैं |उनके हर आदेश का पालन होना चाहिए,बिल्कुल वैसे ही जैसे स्विच दबाते ही पंखा चलने लगता है |पर वो तो एक निर्जीव मशीन है | मैं एक इंसान हूँ मेरी भी कुछ भावनाएँ हैं,कुछ इच्छाएँ हैं पर इन सब से उन्हें कोई मतलब नही |उनके हुक्म की गुलाम हूँ मैं  |उनकी निगाह में मैं मात्र एक "चीज" हूँ जिसे जब चाहें और जैसे चाहें वो इस्तेमाल करें उनकी मर्जी | बदले में मुझे कपड़े गहने की कमी नही है | मैं रोज मरती हूँ क्या करूँ अब तो आदत सी हो गई इसी तरह से जीने की | दी ने एक लम्बी साँस ली और अपने आसूँ आँचल से पोछने लगीं |

मैं बोली - दी कैसे सहती हो ये सब बड़ी मम्मी से बताया क्यों नही | आवाज क्यों नही उठाती उन के खिलाफ | दी बोलीं - शुरू-शुरू में तो ये सोच के चुप रही की कुछ दिनों बाद सब ठीक हो जायेगा | ससुराल की बात मायके में क्या बताऊँ,भाभियाँ हंसेगीं | माँ को बता के उन्हें क्यों दुख दूँ और किस के बल पे आवाज उठाऊं,बाबूजी होते तो बात और थी | शरम की वजह से भी नहीं बता पायी | मैने भी तो कोई उच्च शिक्षा नही ली जो इनसे अलग हो के कही नौकरी कर सकूँ | अब बहुत देर हो गई इन बातों के लिए |कोई कदम उठाती हूँ तो अपनी बेटियों को ले कर कहा जाऊँगी,वो पढ़ रही हैं | अब तो बस उन्ही दोनों को देख कर जी रही हूँ | मेरा दिल बहुत दुखी हुआ ये सब सुन कर पर मैं कर भी क्या सकती थी |

शाम होने को थी | हम दोनों उठ कर उदास मन से घर की तरफ चल दी | उस रात हम दोनों कुछ खा ना सकी | भाभियों ने मजाक किया "दोनों दीदीयों का पेट तो एक दूसरे से मिल के ही भर गया है,खाने की जगह कहा है उस में" | हमने एक खोखली हँसी के साथ थाली वापस कर दी | रात में हम एक साथ ही सोये |

मै बोंली - दीदी जीजा जी ऐसे होंगें,मैंने तो सोच भी नहीं था | औरत को अपने पैर की जूती समझते हैं, वो भी आज के ज़माने में |
दी बोलीं - अब मेरी ही किस्मत खराब है तो मै क्या करूँ और दी सिसकने लगी | मैंने दी को अपनी बाहों में भर के सीने से लगा लिया | मैं भी अपने आँसू रोक नही पायी | ना जाने कब हम दोनों की आँख लग गई |अगले दिन ही मुझे वापस बनारस लौटना था |

जल्दी चलो ट्रेन का समय हो रहा है | भैया की आवाज आयी | मैं सब से गले मिल रही थी | सब की आँखें डबडबाई थी,मेरी भी | सब से आखीर में मैं अपनी रानी दी के गले लगी,हम दोनों लिपट कर खूब जी भर के रोईं हमें बड़ी मम्मी ने अलग किया और मुझे पकड़ कर जीप में बैठा दिया,ये पहले ही बैठ चुके थे |

मैंने रोते-रोते ही हाथ हिला के टा टा किया | मैंने देखा सभी अपनी आँखे पोंछ रहें थे | जीप आगे बढ़ गई और घर मेरी आँखों से ओझल हो गया | एक बार फिर मै जोर से सिसक पड़ी तभी भैया की आवाज सुनाई दी "अब चुप हो जा ढेर मति रोवा नाही त कपरा बत्थे लागी" (ज्यादा ना रो नही तो सिर दर्द होगा) |


( मैं तो अपनी रानी दी के लिए कुछ भी नहीं कर पायी | रानी दी ने भी परिस्थितियों से समझौता कर लिया था पर उनकी इस हालत का जिम्मेदार कौन है | आज भी गांवों में शिक्षा पूरी होने से पहले ही लड़कियों की शादी पैसे वाला घर देख के कर दी जाती है भले ही लड़का शिक्षित हो या ना हो | उनका जवाब होता है कि बेटी को खाने पहनने की कमी नही होगी | एक दूसरा पहलू भी है कि हम जन्म से ही लड़की को परायाधन मान लेते हैं और ये बात लड़की के मन में बैठ जाती है फिर ससुराल में उसके साथ कितना भी अत्याचार हो वो मायके जाने की हिम्मत नही जुटा पाती )

मीना पाठक    



Sunday, December 30, 2012

अंतर्मन

नमस्कार

कुछ अपने अंतर की

कुछ दुनिया के अंतर की

अंतर करना

अंतर्मन में